इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में विकास का जिम्मा संभालने वाला इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) इन दिनों अपनी ही संपत्तियों की सुरक्षा करने में बौना साबित हो रहा है। मूसाखेड़ी स्थित आईडीए मल्टी स्कीम नंबर 94 से आई एक सनसनीखेज शिकायत ने विभाग के भीतर बैठे सफेदपोशों और कब्जाधारियों के बीच पनप रहे एक “अपवित्र गठबंधन” को उजागर कर दिया है। शिकायतकर्ता सपना स्वामी ने मुख्य कार्यपालिका अधिकारी के सामने जो कच्चा चिट्ठा खोला है, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जिसमें रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहा है। आरोप है कि विभाग का ही एक कर्मचारी, जिसे सरकारी संपत्तियों की निगरानी का जिम्मा दिया गया था, वही अवैध कब्जों का सूत्रधार बना बैठा है।

सुपरवाइजर की ‘छतरी’ और अवैध गतिविधियों की मंडी, आखिर कब जागेगा सोया हुआ प्रशासन?
स्थानीय रहवासियों के सब्र का बांध अब टूट चुका है क्योंकि जी-ब्लॉक के मकान नंबर 116 में जो कुछ हो रहा है, उसने पूरी मल्टी की शांति और शुचिता को भंग कर दिया है। शिकायत के मुताबिक, इस मकान पर अनिता पटेल नामक महिला का कब्जा है, जिसे कथित तौर पर आईडीए सुपरवाइजर दिलीप बाबा का संरक्षण प्राप्त है। आरोप है कि यह आवास अब केवल एक मकान नहीं, बल्कि संदिग्ध चेहरों की शरणस्थली बन चुका है। दिन-रात होने वाली अनजान लोगों की आवाजाही और अनैतिक कार्यों की सुगबुगाहट ने यहाँ रहने वाले परिवारों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के लिए मानसिक तनाव पैदा कर दिया है। जब भी कोई इस अराजकता के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे गाली-गलौज और विवाद का सामना करना पड़ता है, जिससे पूरी मल्टी का माहौल जहरीला हो गया है।
छापेमारी से पहले ‘मुखबिरी’ का खेल, आईडीए के भीतर बैठे आस्तीन के सांपों ने उड़ाई नियमों की धज्जियाँ
सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू यह है कि प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने के लिए विभाग के ही तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है। शिकायत में स्पष्ट उल्लेख है कि जब कभी उच्च अधिकारियों तक शिकायत पहुँचती है और वे कार्रवाई का मन बनाते हैं, तो सुपरवाइजर की ‘मुखबिरी’ तंत्र को फेल कर देती है। अधिकारियों के पहुँचने से पहले ही कब्जाधारी महिला को ताला लगाकर भागने की सूचना दे दी जाती है और प्रशासन की टीम बैरंग लौट जाती है। यह लुका-छिपी का खेल न केवल सरकारी तंत्र का मजाक उड़ा रहा है, बल्कि उन ईमानदार अधिकारियों की मेहनत पर भी पानी फेर रहा है जो व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहते हैं। आखिर एक मामूली कर्मचारी की इतनी हिम्मत कैसे है कि वह सरकारी आदेशों की मुखबिरी कर अवैध कब्जे को संरक्षण दे रहा है?
न्याय की गुहार और मल्टीवासियों का अल्टीमेटम, क्या फाइलों में दबकर रह जाएगी यह गंभीर शिकायत?
मूसाखेड़ी की इस मल्टी में रहने वाले लोग अब इस खौफ और गंदगी के साये में जीने को मजबूर हैं। सपना स्वामी द्वारा दिए गए आवेदन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि जल्द ही अनिता पटेल के अवैध कब्जे को नहीं हटाया गया और संलिप्त कर्मचारियों पर गाज नहीं गिरी, तो जन-आक्रोश का फूटता ज्वालामुखी प्रशासन के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकता है। बार-बार आजाद नगर थाने और आईडीए दफ्तर के चक्कर काटने के बाद अब जनता की उम्मीदें सीधे मुख्य कार्यपालिका अधिकारी की मेज पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन अपने विभाग की छवि धूमिल करने वाले इन ‘काली भेड़ों’ को बाहर का रास्ता दिखाएगा, या फिर रसूख और सांठगांठ की यह फाइल हमेशा की तरह ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी?









