आरटीओ का पाप-महल, कमरा नंबर 2 और पंचर पुत्र का समानांतर शासन, क्या प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं?

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देवास। भ्रष्टाचार जब व्यवस्था की रगों में कैंसर बनकर दौड़ने लगे, तो कानून की किताबें रद्दी के भाव बिकने लगती हैं। देवास आरटीओ कार्यालय का ‘कमरा नंबर 2’ आज इसी कड़वे सच का गवाह बना हुआ है। 7 फरवरी 2026 को हुए बड़े खुलासे के बाद भी प्रशासनिक गलियारों में छाई ‘अपराधी चुप्पी’ यह बताने के लिए काफी है कि विभाग की मर्यादा अब किसी नियम-कायदे से नहीं, बल्कि एक तथाकथित ‘पंचर वाले’ की तिजोरी से तय हो रही है। तबादले के नोटिस सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं, क्योंकि हकीकत में सत्ता आज भी उसी सुभाष जैन के पास है, जिसने कभी साइकिल के टायरों में हवा भरते हुए आरटीओ की धूल चाटना शुरू किया था।

सौरभ शर्मा जैसा सिंडिकेट और सुभाष का साम्राज्य, क्या देवास में भी होगा महाविस्फोट?

विभाग के भीतर आज एक ही चर्चा आम है—क्या सुभाष जैन, देवास का दूसरा सौरभ शर्मा बन चुका है? जिस तरह सौरभ शर्मा के काले साम्राज्य का अंत हुआ, ठीक उसी तर्ज पर सुभाष ने भी भ्रष्टाचार की ऐसी बिसात बिछाई है जहाँ अधिकारी केवल ‘मोहरे’ बनकर रह गए हैं। सूत्रों का दावा है कि समाचारों के माध्यम से पोल खुलने के बाद यह ‘पंचर माफिया’ बौखलाया हुआ है। अपनी गर्दन फंसती देख अब यह कलम को खरीदने की नाकाम कोशिशों में जुटा है। विडंबना देखिए कि जिन अधिकारियों को इस पर नकेल कसनी थी, वे भारी-भरकम ‘नजराने’ और कड़क नोटों की सुगंध के आगे अपनी अंतरात्मा गिरवी रख चुके हैं। निचले तबके के कर्मचारी जहाँ काम के बोझ और ईमानदारी की सजा भुगत रहे हैं, वहीं साहबों की मेजों पर सुभाष द्वारा परोसी गई ‘भ्रष्टाचार की रेवड़ियां’ विभाग के इकबाल का गला घोंट रही हैं।

रात के अंधेरे में सरकारी ID का ‘चीरहरण’, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है फर्जीवाड़े का यह खेल?

सरकारी सर्वर, गोपनीय आईडी और ओटीपी—ये वो शब्द हैं जो किसी भी विभाग की सुरक्षा की रीढ़ होते हैं। लेकिन देवास आरटीओ में यह सब एक प्राइवेट व्यक्ति के मोबाइल की उंगलियों पर नाच रहे हैं। खबर है कि रात के सन्नाटे में, जब पूरी दुनिया सोती है, तब सुभाष जैन के इस ‘गुप्त सचिवालय’ में फर्जी फिटनेस और अवैध डेटा एंट्री का खेल परवान चढ़ता है। आखिर प्रशासन की वो कौन सी मजबूरी है कि तबादले के बाद भी कमरा नंबर 2 की चाबी इस बाहरी शख्स से नहीं छीनी जा सकी? क्या विभाग के ऊंचे पदों पर बैठे लोग यह भूल चुके हैं कि एक गैर-आधिकारिक व्यक्ति को सरकारी डेटा सौंपना न केवल अपराध है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है?

चटाई से करोड़ों के महल तक, चरण-चुंबन और भ्रष्टाचार की वो सुनामी जिसने सबको डुबो दिया!

1998 में ₹50 की दिहाड़ी के लिए तरसने वाला युवक आज अरबों की बेनामी संपत्ति का मालिक कैसे बन गया? यह सवाल देवास के हर ईमानदार नागरिक के गाल पर एक तमाचा है। पुष्प कुंज के किराए के कमरे से निकलकर सिंधी कॉलोनी के आलीशान महलों और इंदौर रोड के करोड़ों के निवेश तक का यह सफर, पसीने की कमाई से नहीं बल्कि आम जनता के खून-पसीने के टैक्स की चोरी से बना है। सोने के भारी आभूषणों से लदा सुभाष का शरीर दरअसल अधिकारियों की उस ‘चाटुकारिता’ का प्रतीक है, जहाँ नियम-कायदे चौखट पर दम तोड़ देते हैं। पूर्व में कई कर्मचारियों ने साक्ष्यों के साथ आवेदन दिए, लेकिन उन शिकायतों को फाइलों के नीचे दबा दिया गया क्योंकि उन फाइलों पर ‘भ्रष्टाचार के बेताज बादशाह’ का वरदहस्त था।

प्रशासनिक लकवे का इलाज कब? भोपाल के बाद अब देवास की बारी, क्या टूटेगा यह तिलस्म?

देवास प्रशासन के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है। क्या कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारी इस ‘दो नंबर रूम’ के काले सच को स्वीकार करने का साहस दिखाएंगे? या फिर इसी तरह फाइलों में नोटों की गंध आती रहेगी और विभाग की अस्मत लुटती रहेगी? जनता देख रही है कि कैसे एक पंचर बनाने वाला आज आरटीओ का ‘भाग्य विधाता’ बनकर बैठा है। अगर अब भी इस ‘पंचर माफिया’ पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि देवास आरटीओ में कानून का राज नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का ‘स्वर्ण साम्राज्य’ चलता है।