आरटीओ का दो नंबर रूम और पंचर वाले का स्वर्ण साम्राज्य, भ्रष्टाचार के इस रहस्यमयी तिलस्म को कब तोड़ेगा प्रशासन?

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तबादले के नोटिस के बाद भी आखिर क्यों नहीं छिनी गई सुभाष पंचर वाले से गुप्त कक्ष की चाबी?

क्या विभाग की गरिमा और नियम-कायदे इसी कमरे की चौखट पर दम तोड़ चुके हैं?


आरटीओ में पिछले खुलासों ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तो मचाई और कुछ जिम्मेदार चेहरों को तबादले का नोटिस थमाकर खानापूर्ति भी की गई, लेकिन मूल समस्या आज भी विभाग के सीने पर मूंग दल रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर उस ‘दो नंबर रूम’ में ऐसा क्या छिपा है जिसकी चाबी आज भी सुभाष ‘पंचर वाले’ के कब्जे में है? वह कौन सा सरकारी और गैर-सरकारी काम है जो इस गुप्त कक्ष में बिना किसी आधिकारिक पद वाले व्यक्ति की मर्जी के पूरा नहीं होता? सन 1998 में बी.पी.एन. के पास साइकिल की दुकान पर पंचर जोड़ने वाला एक मामूली युवक, जो 1999 में विमल जैन राका के साथ आरटीओ की धूल भरी जमीन पर चटाई बिछाकर दलाली के गुर सीखता था, आज अचानक अरबों का आसामी कैसे बन गया? महफिलों में सोने के भारी आभूषणों से लदा उसका शरीर और राजाओं जैसी जीवनशैली उन तमाम ईमानदार करदाताओं के गाल पर तमाचा है, जिनकी गाढ़ी कमाई का हिस्सा इस ‘दो नंबर रूम’ की भेंट चढ़ जाता है।

एटीएस की बंदी और ‘दो नंबर रूम’ का खौफनाक खेल, फाइल पासिंग से लेकर टैक्स चोरी तक के फर्जीवाड़े का क्या यही है कंट्रोल रूम?

सूत्र बताते हैं कि देवास के स्वचालित परीक्षण केंद्र (ATS) पर लगा ताला महज एक संयोग नहीं, बल्कि इसी ‘दो नंबर रूम’ में रची गई एक गहरी साजिश का नतीजा है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि एटीएस के सक्रिय रहने से सुभाष पंचर वाले के समानांतर अवैध टैक्स वसूली और फाइल पासिंग के खेल में बाधा आ रही थी। जानकार बताते हैं कि इस गुप्त कमरे के भीतर वह सब कुछ अंजाम दिया जाता है जो किसी भी सभ्य सरकारी तंत्र के लिए शर्म की बात है। चाहे वह आरटीओ विभाग के गोपनीय डेटा के साथ छेड़छाड़ हो या फिर बैकडेट में फाइलों को वैध बनाना, हर फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड इसी कमरे की दीवारों के बीच बैठता है। आखिर प्रशासन किस मजबूरी में एक ऐसे व्यक्ति को सरकारी परिसर में समानांतर दफ्तर चलाने की अनुमति दे रहा है, जिसकी शुरुआत एक फटी हुई चटाई और साइकिल के टायर में हवा भरने से हुई थी?

किराए के कमरे से इंदौर रोड के करोड़ों के इन्वेस्टमेंट तक, अधिकारियों के ‘चरण-चुंबन’ ने कैसे खड़ा किया यह बेनामी साम्राज्य?

इटावा की पुष्प कुंज कॉलोनी में किराए के मकान में अपनी रातें गुजारने वाला सुभाष आज सिंधी कॉलोनी के मुख्य चौराहे पर करोड़ों के महलनुमा भवन में निवास करता है। इंदौर रोड पर हुए उसके करोड़ों के निवेश और आलीशान जमीनों का अंबार यह चीख-चीखकर कह रहा है कि यहाँ भ्रष्टाचार की गंगा नहीं, बल्कि सुनामी आई थी। विडंबना देखिए कि जो अधिकारी नियम-कायदों की दुहाई देते नहीं थकते, वे ही आज इस ‘पंचर वाले’ के प्रभाव के आगे नतमस्तक होकर उसके ‘चरण-चुंबन’ में अपनी भलाई समझ रहे हैं। अधिकारियों की यह चाटुकारिता और रसूखदारों का संरक्षण ही वह कारण है कि लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसी एजेंसियां इस सोने से लदे ‘कथित सौदागर’ की दहलीज तक पहुँचने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं। क्या विभाग के ये जिम्मेदार लोग अपनी नैतिकता को सुभाष की तिजोरी में गिरवी रख चुके हैं?

सरकारी आईडी और ओटीपी का सरेआम होता सौदा, विभाग की अस्मत को लूटने वाले ‘पंचर माफिया’ पर प्रशासन की चुप्पी आत्मघाती!

आरटीओ विभाग की सबसे गोपनीय चीज—सरकारी आईडी और ओटीपी—आज एक बाहरी और दागदार व्यक्ति के मोबाइल पर नाच रही है। यह न केवल प्रशासनिक मर्यादा का अंतिम संस्कार है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ एक ऐसा खिलवाड़ है जिसकी कीमत आने वाले समय में चुकानी पड़ सकती है। जब एक पंचर बनाने वाला व्यक्ति सरकारी सर्वर का संचालन करने लगे, तो मान लेना चाहिए कि व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। बाबू और अधिकारी जो कभी विभाग की रीढ़ हुआ करते थे, आज इस माफिया के इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियां बन चुके हैं। क्या शासन इस बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि यह भ्रष्टाचार का कैंसर पूरी तरह से लाइलाज हो जाए? क्या ‘दो नंबर रूम’ की चाबी छीनना और इस बाहरी हस्तक्षेप को जड़ से मिटाना प्रशासन के बूते से बाहर हो गया है?

प्रशासनिक इकबाल की अग्निपरीक्षा, क्या महफिलों की चमक और सोने के आभूषणों के पीछे छिपे काले सच की होगी निष्पक्ष जांच?

एक खोजी समाचार का उद्देश्य केवल तथ्यों को उजागर करना है, लेकिन उन तथ्यों पर कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। जिस तरह सौरभ शर्मा के काले साम्राज्य का अंत हुआ, क्या देवास प्रशासन भी उसी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इस ‘पंचर वाले’ के भ्रष्टाचार के सचिवालय पर ताला लगाएगा? यह समाचार उन सोए हुए जिम्मेदार अधिकारियों की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए है जो रसूख और रुपयों के दबाव में अपने कर्तव्य को भूल चुके हैं। जनता की उम्मीदें अब केवल इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस ‘दो नंबर रूम’ के तिलस्म को तोड़कर देवास आरटीओ को इस माफिया के चंगुल से मुक्त कराएगी या फिर भ्रष्टाचार की यह महफिल यूँ ही सजती रहेगी।