इंदौर के नंदानगर स्थित बीमा अस्पताल अब मरीजों की ईमारदारी के लिए नहीं, बल्कि गरीबों की मजबूरी की बोली लगाने वाले ‘कसाईखाने’ के रूप में कुख्यात हो गया है। यहाँ मानवता सिसक रही है और भ्रष्टाचार दहाड़ रहा है। 15-15 सालों से अस्पताल की रग-रग से वाकिफ हाउसकीपिंग स्टाफ को नई कंपनी ने किसी नियम के तहत नहीं, बल्कि वसूली के लालच में बाहर का रास्ता दिखा दिया। आरोप है कि संजय पाल, दिलीप चौकसे और योगेश चौधरी जैसे गुर्गों ने इन गरीब महिलाओं की गर्दन पर तीस-तीस हजार रुपए की रिश्वत की तलवार लटका दी थी। जब इन लाचारों ने अपनी खाली जेबें दिखाईं, तो उन्हें आठवीं की मार्कशीट का फर्जी बहाना बनाकर नौकरी से बेदखल कर दिया गया। यह कैसा इंसाफ है जहाँ पंद्रह साल का अनुभव एक कागज के टुकड़े और चंद नोटों की गड्डियों के आगे हार गया?

कलेक्टर की चौखट और थाने की दहलीज पर दम तोड़ती न्याय की उम्मीद, आखिर कौन है इनका आका?
हैरानी और शर्म की बात यह है कि ये बेसहारा कर्मचारी न्याय की गुहार लेकर कलेक्टर ऑफिस की सीढ़ियां चढ़े और हीरानगर थाने के चक्कर काटे, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। कलेक्टर साहब की फाइलों में शायद इन गरीबों के आँसू फिट नहीं बैठते और थाने में दी गई शिकायतों पर कार्रवाई के नाम पर ‘जीरो बटा सन्नाटा’ पसरा हुआ है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में मूकदर्शक बन जाएं तो समझ लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। सूत्रों की मानें तो अस्पताल के भीतर बैठे कुछ ‘सफेदपोश’ ही इन दलालों को सुपरवाइजर बनवाते हैं ताकि उनके जरिए उगाही का मोटा हिस्सा ऊपर तक पहुँच सके। यही वजह है कि सैकड़ों शिकायतों के बाद भी संजय पाल और उसकी मंडली खुलेआम घूम रही है और कर्मचारियों को किश्तों में रिश्वत देने के लिए धमका रही है।

प्रमोशन की मंडी में बिक रही है ईमानदारी,CMHO की रहस्यमयी चुप्पी और व्यवस्था का गलित कोढ़!
बीमा अस्पताल में सिर्फ भर्ती ही नहीं, बल्कि ‘पदोन्नति’ (प्रमोशन) भी खुले बाजार में बिक रही है। यहाँ काबिलियत और वरिष्ठता की कोई औकात नहीं है; प्रमोशन की कुर्सी केवल उसी को नसीब होती है जो दलालों की तिजोरी भर सकता है। एक गरीब कर्मचारी, जो पिछले दो सालों से आँखों में तरक्की का सपना लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है, उसकी उम्मीदों को घुसखोरी के दैत्य ने निगल लिया है। सबसे बड़ा सवाल CMHO (मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) की भूमिका पर है। क्या उन्हें अस्पताल में चल रहे इस तांडव की भनक नहीं है? या फिर ‘ऊपर तक’ पहुँचने वाली मलाई ने उनकी जुबान पर ताला जड़ दिया है? स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों की यह रहस्यमयी चुप्पी सीधे तौर पर इन अपराधियों को संरक्षण देने के समान है।

नर्सिंग अर्दली से लेकर सुरक्षागार्ड तक,कमीशन तंत्र ने अस्पताल को बनाया वसूली का अड्डा!
यह खेल सिर्फ सफाईकर्मियों तक महदूद नहीं है; सुरक्षागार्ड और नर्सिंग अर्दली की नियुक्तियों में भी ‘रेवड़ियों’ की तरह पद बांटे जा रहे हैं। अस्पताल प्रशासन की शह पर बरसों से यह सिंडिकेट फल-फूल रहा है। नर्सिंग अर्दली में जो रिलीवर ईमानदारी का चोला पहनकर रिश्वत देने से मना कर देता है, उसे नंबर आने के बावजूद दरकिनार कर दिया जाता है, जबकि नए-नए लोगों को पैसे की चमक के दम पर रातों-रात रेगुलर कर दिया जाता है। यह इंदौर के माथे पर कलंक है कि एक सरकारी संस्थान में सरेआम गरीबों का शोषण हो रहा है और पूरा प्रशासनिक अमला कुंभकर्णी नींद सो रहा है। क्या इन महिलाओं के आँसू सत्ता के गलियारों तक पहुँचेंगे, या फिर रिश्वतखोरी का यह कैंसर इस पूरे अस्पताल को लील जाएगा?










