
उज्जैन। आज जब कड़ाके की ठंड में पूरा शहर रजाईयों में दुबका था तब बाबा महाकाल के आंगन में एक ऐसी घटना घटी जिसने मेरी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। दरबार की दहलीज पर पहुँचते ही एक अजीब सी कराह और सिसकियों की आहट ने मेरे कदम रोक दिए। पीछे मुड़कर देखा तो मंदिर के समीप भिक्षा मांगकर जीवन बसर करने वाले एक वयोवृद्ध गुरुजी महाकालेश्वर मंदिर के गगनचुंबी शिखर को एकटक निहार रहे थे और उनकी आँखों से बहते आंसू उनकी सफेद दाढ़ी को भिगो रहे थे। यह दृश्य इतना विचलित करने वाला था कि मैंने अपनी गाड़ी तुरंत किनारे लगाई और उनके पास जाकर उनके चरणों में शीश नवाया। मैंने पूछा कि गुरुजी इस हाड़ कंपाने वाली ठंड में आपके इन आंसुओं का क्या सबब है आखिर कौन सी पीड़ा आपको भीतर तक खाए जा रही है? गुरुजी ने जब अपनी धुंधली आँखों से मेरी ओर देखा और जो दास्तां सुनाई वह किसी भी इंसान के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी थी। उन्होंने कहा कि बेटा मैं अपनी गरीबी पर नहीं रो रहा बल्कि मैं तो उस महाकाल के शिखर को साक्षी मानकर उन लोगों की मति पर रो रहा हूँ जो इस पवित्र दरबार को भी भ्रष्टाचार का अड्डा बना चुके हैं। उन्होंने भर्राई आवाज में कहा कि प्रभु के नाम पर, उनकी सुविधाओं के नाम पर यहाँ हर शख्स भ्रष्टाचार के नए-नए रास्ते खोज रहा है और सरेआम महाकाल को ठगा जा रहा है। गुरुजी का एक-एक शब्द मेरे सीने में तीर की तरह चुभ रहा था जब उन्होंने कहा कि मैं केवल यह सोचकर सिसक रहा हूँ कि जो लोग प्रभु के नाम पर तिजोरियां भर रहे हैं उन्हें महाकाल का दंड कब मिलेगा? यह कोई साधारण आंसू नहीं थे बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ एक संत की बददुआ थी जिसने भक्ति को व्यापार और मंदिर को लूट का अड्डा समझ लिया है।

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक।
गुरुजी के साथ हुआ यह संवाद शहर के उन वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारियों के गाल पर एक तमाचा है जो सिंहस्थ 2028 के नाम पर केवल फाइलों का पेट भर रहे हैं। 2200 कमरों का ‘श्री महाकालेश्वर भक्त निवास’ हो या मंदिर विस्तार का कार्य, हर जगह भ्रष्टाचार की दीमक ने इस पवित्र धरा को खोखला कर दिया है। तीन साल से भक्त निवास के नाम पर केवल बाउंड्री और गेट का झुनझुना पकड़ाने वाले यूडीए के जिम्मेदार अधिकारियों को शायद यह अंदाजा नहीं है कि एक संत की आँखों से गिरा हर कतरा उनकी कुर्सियों की चूलें हिलाने की ताकत रखता है। जब तत्कालीन प्रशासक संदीप सोनी के दौर की अधूरी प्लानिंग और वर्तमान प्रशासन की ‘दानदाता’ तलाशने वाली सुस्ती को एक संत की नजर से देखते हैं तो समझ आता है कि यहाँ विकास नहीं बल्कि केवल विनाशकारी लूट मची है। अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बैठकर केवल समय काट रहे हैं और जनता को विकास का वह चश्मा पहना रहे हैं जिसमें केवल झूठे सपने दिखाई देते हैं।
इंसानियत के नाम पर सब नोच खा गए,
वो महाकाल के घर को भी अपना व्यापार बना गए।
महाकाल लोक के निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हो या यूनिटी मॉल का अधूरा ढांचा, हर ईंट भ्रष्टाचार की गवाही दे रही है। उस बुजुर्ग संत के आंसू यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या 672 करोड़ या 200 करोड़ की ये भारी-भरकम राशि केवल अधिकारियों की अय्याशी और ठेकेदारों की जेब भरने के लिए है? क्या सिंहस्थ 2028 से पहले ये प्रोजेक्ट्स कभी पूरे होंगे या फिर श्रद्धालुओं को बदइंतजामी के सैलाब में धकेल दिया जाएगा? उज्जैन विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार जिस लापरवाही से काम कर रहे हैं वह साफ दर्शाता है कि उन्हें न तो महाकाल का डर है और न ही जनता के प्रति कोई जवाबदेही। गुरुजी की वह करुण पुकार और उनके वे आंसू आज पूरे उज्जैन के आसमान में गूंज रहे हैं कि प्रभु अब इन भ्रष्टाचारियों का अंत कब होगा? यह समाचार केवल शब्दों का मेल नहीं है बल्कि उस बेबस संत की आत्मा की चीख है जो इस भ्रष्टाचार के नग्न नाच को अब और देख पाने में असमर्थ है। शासन-प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन जब तक मंदिर के आंगन में बैठा एक संत दुखी है तब तक अवंतिका का विकास केवल एक छल है। अब देखना यह है कि क्या इन आंसुओं की गर्माहट से सोई हुई प्रशासनिक मशीनरी जागेगी या फिर अगले सिंहस्थ तक हम केवल नए घोटाले और नई फाइलों का ढेर ही देखेंगे।
दुआएं बददुआएं सब जमा होती हैं ऊपर,
बड़ा बेरहम होता है महाकाल का हिसाब।










