प्रेम की चकाचौंध के पीछे छिपा राष्ट्र का गहरा घाव

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आज जब पूरा देश लाल गुलाबों की खुशबू और वैलेंटाइन डे के उपहारों में डूबा है, तब हवा में एक अजीब सी खामोश टीस भी महसूस होती है। अवंतिका के युवराज इस कड़वे सच को उजागर करने से पीछे नहीं हटेंगे कि हमारे देश का युवा वर्ग पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में इस कदर खोया है कि उसे अपने ही आँगन में बिखरा हुआ खून नजर नहीं आ रहा। 14 फरवरी केवल प्रेम प्रसंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह वह काला दिन है जिसने भारत माता की गोद सूनी कर दी थी। साल 2019 का वह मंजर याद कीजिए, जब पुलवामा की सड़कों पर हमारे जवानों के शरीर के चिथड़े उड़ गए थे। अवंतिका के युवराज सवाल उठाते हैं कि क्या आज का युवा यह भूल गया है कि उसकी सुरक्षित डेट्स और सुकून भरी रातों की कीमत सरहद पर तैनात उन बेटों ने अपनी जान देकर चुकाई है?

पुलवामा का वो खौफनाक मंजर और दुश्मन की कायराना साजिश

उस दिन दोपहर का वक्त था जब सीआरपीएफ के 78 वाहनों का काफिला जम्मू से श्रीनगर की ओर जा रहा था। करीब 2500 जवान अपनी ड्यूटी पर तैनात होने के लिए निकले थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि घर से दूर मौत उनका इंतजार कर रही है। पुलवामा के लेथपोरा में अचानक एक विस्फोटक लदी स्कॉर्पियो ने जवानों की बस को टक्कर मार दी। देखते ही देखते एक भयानक धमाका हुआ और पूरा इलाका धुएं और मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। अवंतिका के युवराज के पास मौजूद जानकारी के अनुसार, इस हमले के पीछे पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का हाथ था। आदिल अहमद डार नाम के एक फिदायीन हमलावर ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया, जिसे सीमा पार बैठे आकाओं का पूरा समर्थन प्राप्त था।

खुफिया तंत्र की विफलता और अनसुलढे सवालों का घेरा

पुलवामा हमला महज एक आतंकी घटना नहीं थी, बल्कि यह हमारे सुरक्षा तंत्र की एक बड़ी चूक भी मानी जाती है। अवंतिका के युवराज के विशेष सूत्रों और उस वक्त की रिपोर्ट्स ने संकेत दिया था कि खुफिया एजेंसियों को हमले के इनपुट्स मिले थे, फिर भी इतने बड़े काफिले को एक साथ बिना पर्याप्त सुरक्षा जांच के निकलने दिया गया। आज तक यह सवाल हवा में तैर रहा है कि आखिर 300 किलो से ज्यादा आरडीएक्स (RDX) इतनी भारी सुरक्षा वाले इलाके में पहुँचा कैसे? क्या इसमें किसी अंदरूनी मुखबिरी का हाथ था या फिर यह व्यवस्था की घोर लापरवाही थी? अवंतिका के युवराज इन तीखे सवालों का जवाब आज भी मांगते हैं, क्योंकि उन 40 शहीदों का लहू केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि जवाबदेही मांगता है।

राजनीति का गिरता स्तर और जवानों की शहादत पर रोटियां

बेहद अफसोस की बात है कि आज की राजनीति में जवानों की शहादत को केवल चुनाव जीतने का एक जरिया बना दिया गया है। अवंतिका के युवराज आज इस कड़वी राजनीति का पर्दाफाश करते हैं—जब हमला होता है, तो नेताओं के भाषणों में उबाल आता है, लेकिन जैसे ही वक्त गुजरता है, उन शहीदों के परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। राजनीति अब संवेदनाओं से नहीं, बल्कि वोट बैंक के समीकरणों से चलती है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाने में व्यस्त रहता है और विपक्ष केवल आरोप लगाने में, लेकिन उस मां के आंसुओं की किसी को परवाह नहीं जिसकी बुढ़ापे की लाठी छीन ली गई। जवानों की नौकरी और उनका जीवन आज भी दिन-रात खतरे में रहता है, लेकिन उनके कल्याण और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों पर बहस करने के बजाय, राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे को नीचा दिखाने में अपनी ऊर्जा खर्च करती हैं।

युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी और ब्लैक डे का असली अर्थ

अगर हम आज भी 14 फरवरी को केवल ‘प्यार’ के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं, तो यह उन शहीदों का अपमान है। अवंतिका के युवराज का यह स्पष्ट संदेश है कि युवाओं को यह समझना होगा कि बिना देश के कोई प्रेम, कोई भविष्य और कोई अस्तित्व नहीं है। आज का दिन ‘ब्लैक डे’ है—उन वीरों को याद करने का जिन्होंने हमारे कल के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया। हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। जब तक देश का युवा अपने शहीदों की शहादत पर मौज-मस्ती को प्राथमिकता देता रहेगा, तब तक हम एक सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़े नहीं हो पाएंगे। इस वैलेंटाइन डे पर हाथ में गुलाब लेने से पहले एक बार उन 40 जवानों की तस्वीरों को जरूर देख लेना, शायद आपकी रूह कांप जाए।