इंदौर की इस घटना ने आधुनिक समाज और खोखले रिश्तों को किया शर्मसार।
इंदौर मध्य प्रदेश। यह खबर इंदौर के उस बंद पड़े मकान की नहीं, बल्कि हमारी आधुनिक सभ्यता के खोखलेपन की है, जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाए। इंदौर के एक पॉश इलाके में एक बुजुर्ग दंपत्ति की बंद कमरे में हुई मौत ने सफलता और पैसे की अंधी दौड़ पर एक ऐसा तमाचा मारा है, जिसकी गूंज बरसों तक सुनाई देगी। विडंबना देखिए कि जिन बच्चों को काबिल बनाने के लिए माता-पिता ने अपनी पूरी उम्र और पूंजी लगा दी, वही बच्चे आज सात समंदर पार अमेरिका में करोड़ों के पैकेज पर अपनी ‘सफल’ जिंदगी जी रहे हैं, जबकि यहां उनके माता-पिता के शवों को अपनों के कंधे तक नसीब नहीं हुए। पूरे तीस दिनों तक वह घर एक श्मशान बना रहा, लेकिन उन करोड़ों रुपयों ने एक बार भी खिड़की खटखटाकर यह नहीं पूछा कि अंदर सांसें चल रही हैं या नहीं।
यह घटना हमें उस कड़वे सच से रूबरू कराती है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर बैंक बैलेंस या विदेशी डिग्रियां काम नहीं आतीं। जब प्राण पखेरू उड़ते हैं, तो वह डॉलर और आलीशान बंगला साथ नहीं जाता, बल्कि वह पड़ोसी और दोस्त ही काम आते हैं जिन्हें हम अक्सर वक्त की कमी का बहाना देकर नजरअंदाज कर देते हैं। हम जिस स्वार्थ और पैसे के पीछे अपनों को धोखा देते हैं या रिश्तों की बलि चढ़ा देते हैं, वह अंत समय में कितनी बड़ी भूल साबित होती है, यह इंदौर की इस हृदयविदारक घटना ने साफ कर दिया है। इंसान की असली दौलत वह चार कंधे और वह भीड़ है जो उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होती है।
अतः आज यह सोचने का समय है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। पैसा पेट भरने और भौतिक सुखों के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन आत्मा की शांति और सदगति के लिए केवल और केवल सच्चे रिश्तों की ही दरकार होती है। अगर आपके पास पड़ोसी नहीं है, वफादार दोस्त नहीं हैं और अपनों का साथ नहीं है, तो आप दुनिया के सबसे गरीब इंसान हैं। अपने माता-पिता, अपने पुराने साथियों और अपने पड़ोसियों को समय दीजिए, क्योंकि अंत में लाश वही उठाते हैं। रिश्तों में धोखा और स्वार्थ को जगह न दें, क्योंकि जब सांसें टूटेंगी तो अमेरिका में बैठा बेटा नहीं, बल्कि बगल वाले घर से दौड़कर आया वह पड़ोसी ही आपकी चिता को अग्नि देगा।










