उज्जैन। विकास की चमक अक्सर गरीबों और मध्यमवर्गीय व्यापारियों के आंसुओं को ढक लेती है। उज्जैन के इंदिरा नगर चौराहे से हरिफाटक ब्रिज तक प्रस्तावित फोरलेन ब्रिज और सिक्सलेन सड़क निर्माण के नाम पर प्रशासन ने एक ऐसी विनाशकारी योजना तैयार की है, जो हजारों परिवारों को सड़क पर लाने वाली है। बरसों से दिन-रात एक करके जिन व्यापारियों ने अपनी साख बनाई, अपनी दुकानों को खड़ा किया और अपने सपनों का मकान बनाया, आज प्रशासन की एक ‘लाल लकीर’ ने उनकी रातों की नींद छीन ली है। बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी विधिक सहमति के, तानाशाही पूर्ण तरीके से व्यापारियों की निजी संपत्तियों पर निशान लगा दिए गए हैं। यह विकास नहीं, बल्कि उन छोटे और मध्यम व्यापारियों का सामूहिक संहार है जो उज्जैन की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
मास्टर प्लान का मायाजाल और उजाड़ता व्यापार, 20 से 50 फिट तक जमीन हड़पने का खूनी खेल
प्रशासन और नगर पालिक निगम उज्जैन मास्टर प्लान 2035 का अनुचित हवाला देकर इस विनाशकारी ब्रिज का निर्माण कर रहे हैं। व्यापारियों का आरोप है कि इस योजना के तहत उनकी बेशकीमती जमीनों का 20 से 50 फिट तक का हिस्सा अवैध रूप से छीना जा रहा है। जिस जमीन की कीमत आज करोड़ों में है और जिस पर हजारों श्रमिकों और कर्मचारियों के परिवारों का पेट पलता है, उसे बिना किसी मुआवजे या वैकल्पिक व्यवस्था के ढहाने की तैयारी है। जब हमारी टीम ने इन व्यापारियों से बात की, तो उनकी आंखों से निकलता दर्द पत्थर को भी पिघला दे। एक बुजुर्ग व्यापारी ने रुंधे गले से कहा, “साहब, हमने जवानी खपा दी इस दुकान को खड़ा करने में, अब इस उम्र में हम कहाँ जाएंगे? क्या सरकार हमें सड़क पर मारना चाहती है?
अतीत की उदारता बनी आज की सजा, पहले भी दी थी जमीन अब फिर से उजाड़ने की जिद क्यों?
यह पहली बार नहीं है जब इन व्यापारियों ने शहर के विकास के लिए त्याग किया है। पिछले सिंहस्थ के समय भी पूर्वी मास्टर प्लान के तहत इन्हीं व्यापारियों ने स्वेच्छा से अपनी 15 से 20 फिट जमीन रोड चौड़ीकरण के लिए प्रशासन को सौंप दी थी। उस वक्त भी न तो कोई मुआवजा मिला और न ही कोई राहत, लेकिन शहर के हित में व्यापारियों ने चुप्पी साधे रखी। अब दोबारा उसी जगह पर फिर से चौड़ीकरण करना और व्यापारियों के बचे-कुचे अस्तित्व को भी मिटा देना पूरी तरह से असंवैधानिक और अनैतिक है। एक बार चौड़ीकरण होने के बाद दोबारा उसी भूमि पर नजर डालना प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ब्रिज की जरूरत किसे? अनावश्यक निर्माण से बढ़ेगी यातायात की समस्या, व्यापार होगा पूरी तरह चौपट
व्यापारियों का स्पष्ट कहना है कि इस मार्ग पर ब्रिज की कोई आवश्यकता नहीं है। यह ब्रिज न तो उपयोगी है और न ही जनता की मांग। यह केवल कागजी आंकड़ों को चमकाने और करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने का एक जरिया मात्र प्रतीत हो रहा है। इस ब्रिज के निर्माण से न केवल नीचे का व्यापार पूरी तरह खत्म हो जाएगा, बल्कि यातायात की समस्या और अधिक जटिल हो जाएगी। जब रेलवे और बस स्टैंड के पास पर्याप्त सरकारी भूमि उपलब्ध है, तो प्रशासन निजी संपत्तियों को तोड़ने पर क्यों उतारू है? क्या रेलवे की जमीन पर निर्माण करना साहबों के लिए मुश्किल है, या फिर व्यापारियों को उजाड़ना उन्हें आसान लगता है?
हजारों कर्मचारियों का भविष्य अंधकार में, अगर गिरा हथौड़ा तो सड़कों पर होगा महा-आंदोलन
इस योजना से सीधे तौर पर 3000 से 4000 परिवार प्रभावित हो रहे हैं। इन दुकानों से जुड़े हजारों सेल्समैन, मजदूर, और कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे। यह सिर्फ एक मकान या दुकान टूटने का मामला नहीं है, बल्कि हजारों चूल्हों के बुझने का मामला है। व्यापारियों ने दो टूक चेतावनी दी है कि वे इस विनाशकारी योजना को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगे। यदि प्रशासन ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी और रेलवे या बस स्टैंड की भूमि का उपयोग करने के बजाय व्यापारियों की निजी जमीन पर हाथ डाला तो पूरा व्यापारी समाज समस्त रहवासियों संघ सड़कों पर उतरकर ईंट से ईंट बजा देगा।
क्या व्यापारियों की आह पर खड़ा होगा विकास का यह ढांचा?
माननीय महोदय, न्याय की कुर्सी पर बैठकर जनता का दर्द समझना आपका दायित्व है। जब विकल्प मौजूद हैं तो फिर किसी के आशियाने को उजाड़ना कहाँ का न्याय है? व्यापारियों और समस्त रहवासियों की प्रशासन से यही मांग करता है कि इस योजना पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए। रेलवे और बस स्टैंड की खाली पड़ी जमीन का उपयोग कर विकास को गति दी जा सकती है, किसी की रोजी-रोटी छीनकर नहीं। उज्जैन की जनता देख रही है कि विकास के नाम पर किसका विनाश किया जा रहा है।










